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प्रिय ध्रुवार्थी,
जय जिनेंद्र !
मई माह में महाराष्ट्र में 2 शिविरों का आयोजन किया गया। औरंगाबाद व रुकड़ी। औरंगाबाद शिविर का आयोजन बृहद् स्तर पर किया गया, जिसमें ख्याति प्राप्त विद्वान,श्रेष्ठीगण एवं बड़ी संख्या में शिविरार्थी शामिल होकर शिविर को सफलता प्राप्त हुई ; परंतु यहाॅ बात मैं दूसरे शिविर की कर रहा हूं, जो हमारे ही ध्रुवार्थी भाई पं. स्वप्निल जी लंबू शास्त्री और उनकी टीम द्वारा लगाया गया। उसका समाचार ध्रुवधाम पत्रिका में दिया गया है विशेष जानकारी वहां से पढ़ने योग्य हैं। गौर करने जैसी बात यह है कि ना ज्यादा तामझाम, ना ज्यादा बड़ी टीम, न ही ज्यादा बड़े-बड़े विद्वानों का नाम फिर भी स्थानीय स्तर एवं सीमित साधनों से लगभग 370 ऑनलाइन शिविरार्थियों ने सहभागी होकर तत्व का रसास्वादन किया; और इतना ही नहीं तो नित्य दैनिक कक्षा भी चल रही है जिसमें 35-40 विद्यार्थी नित्य लाभ ले रहे हैं।
भाई स्वप्निल से जब बात हुई तो उसने एक शिविर प्रसंग बताया जो प्रेरणास्पद है। शिविर में कक्षा के दौरान तीर्थंकर के समवशरण का विषय आया। पाठ्यक्रम को दृष्टि में रखते हुए थोड़ा विश्लेषण करके आगे का विषय विद्वान द्वारा बताया जा रहा था परंतु एक छोटे बालक ने उस विषय के प्रति बढ़ती जिज्ञासा के समाधान ना होने पर अन्न का त्याग कर दिया। बालक के माता-पिता द्वारा स्वप्निल जी को फोन से यह बात ज्ञात हुई। स्वप्निल जी ने शिविर की व्यस्तता में प्रथम तो बालक से फोन पर ही अल्प वार्तालाप करके छुटकारा पाने की कोशिश की, परंतु बालक ने रोते-रोते विषय से संबंधित लगभग आधे घंटे तक प्रश्न-प्रतिप्रश्न करते हुए विषय आत्मसात किया।
हर स्थिति अपने साथ सकारात्मकता और नकारात्मकता लेकर आती है। कोरोना के कारण आज इतनी भयानक स्थिति हुई परंतु तत्वज्ञान का रसपान करने और कराने के लिए यह शुभ अवसर लेकर आया है। ज्ञान पिपासु तैयार बैठे हैं बस हमें अर्जित तत्वज्ञान की शीतल बौछार करने की जरूरत है।
यह सब लिखकर ऐसा नहीं कि मैं मात्र स्वप्निल की प्रशंसा कर रहा हूं। हमारे कई ऐसे ध्रुवार्थी भाई है जो इस पवित्र कार्य से जुड़े हुए हैं। पं. संजय 'सिद्धार्थी', इंदौर और उनकी टीम स्थानीय स्तर एवं ऑनलाइन पाठशाला के माध्यम से तो पं. अमित जैन 'अरिहंत', पं. शुभम जैन, भोपाल एवं पं. दीपक जैन, खनियाधाना जैसे विद्वानों ने स्वतंत्र मासिक पत्रिका का संपादन करके जिन शासन की गरिमामय प्रभावना करने में चार चांद लगा दिए हैं।
पं. विपुल जैन, आरोन 'जैन फाउंडेशन' नामक संस्था से जुड़े हुए हैं; जो श्वेतांबर-दिगंबर दोनों समुदाय का विश्व स्तरीय बृहद् मंच है। पं.भूषणजी कालेगोरे, पं.अक्षयजी खोत, जैसे विद्यार्थी ऑनलाइन youtube कक्षा ओके माध्यम से संस्कृत के प्रचार प्रसार में संलग्न है।
पं. अनेकांतजी, पं. आतम जी, पं.नमन जी जैसे कुछ ध्रुवार्थी विद्वान मुमुक्षु विद्यालय से जुड़े हुए है तो पं.आकाश जैन ‘अनंत’, प्रफुल्ल जैन, आरोन कंप्यूटर द्वारा एडिटिंग, ग्राफिक्स, जैन ब्यानर, स्लोगन , यूट्यूब वीडियोज् बनाकर शक्ति-सामर्थ्य अनुसार समाज में अपना योगदान दे रहे हैं।
पं. अविनाश जैन ‘वात्सल्य’, पं. ऋषभ जैन,आगरा के द्वारा नित्य ऑनलाइन धार्मिक कक्षाएं ली एवं कराई जा रही है। कोई नित्य स्थानीय स्तर पर एवं शिविरों में प्रवचन-कक्षाएं लेते हैं तो कोई डॉक्टरेट का अध्ययन कर रहे हैं। कुछ कविताएं, लेख, निबंध लिखकर जिन शासन की पताका फहराने में अपना योगदान दे रहे हैं।
प्रभावना के इस कार्य में संस्था में अध्ययन कर चुका महिला वर्ग भी पीछे नहीं है चाहे फिर वह विदुषी बिपाशा शास्त्री हो, विदुषी पूजा शास्त्री हो या फिर विदुषी अनुप्रेक्षा शास्त्री हो।
ऐसे एक नहीं अनेकों नाम बताए जा सकते हैं। यहां पर तो मेरे बुद्धि से जितना सुनने में, सोशल मीडिया पर देखने में और जो मेरे संपर्क में थे ऐसे मोतियों को इसमें पिरोने का प्रयास किया है।
आप सभी की कर्मठता एवं उभरते हुए उत्साह के सैलाब को देखकर सात्विक गौरव की अनुभूति होती है; एवं ऐसा लगता है कि हमारे महाविद्यालय के भूतपूर्व स्नातक अपनी एवं संस्था की गरिमामय पहचान बनाने में सक्षम हुए हैं। जिनशासन की प्रभावना के लिए ध्रुवार्थी भाइयों के ऐसे सराहनीय प्रयास को देखकर शरीर के रोम-रोम से बार-बार धन्यवाद देने के लिए मन लालायित होता है ।
सच कहूं भाइयों! अनंत तीर्थंकर भगवंतो-आचार्यो एवं जिनवाणी मां द्वारा संप्रेषित ऊर्जा तथा आ. पं. राजकुमार जी शास्त्री भाईसाहब, आ.संजयजी सर, आ.निलय भैया, आ.गणतंत्र भैया, आ.नितुल भैया आदि से वर्तमान में आ.डॉ. प्रवीणकुमार जी शास्त्री तक ध्रुवधाम में अविच्छिन्न रूप से चला आ रहा तत्वज्ञान का श्रृंखलाबद्ध धाराप्रवाह एवं संस्था के प्रति समर्पित आ.महिपाल जी ज्ञायक एवं ज्ञायक परिवार का हम ध्रुवार्थीयों के प्रति अपार स्नेह की फलश्रुति स्वरूप समाज में इतनी सक्रियता और जागरूकता को निरंतर बरकरार रखने में हम सफल हो पा रहे हैं।
जो ध्रुवार्थी भाई जिन शासन की प्रभावना में संलग्न है वे साधुवाद के पात्र तो हैं ही; परंतु जिन को प्रत्यक्ष प्रभावना का अवसर न मिल पाया वे ध्रुवार्थी भाई समाज में उदासीन और निष्क्रिय होकर ना बैठे। सबकी प्रतिभा एक जैसी नहीं होती। हमारे आचार्य-भगवन्तो का वचन है "मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्नः" प्रत्येक जीव की बुद्धि–भाव–परिणाम भिन्न-भिन्न होते है। यह आवश्यक नहीं कि आप प्रभावना मात्र प्रवचन-कक्षा या पैसों से ही कर सकते हैं। प्रभावना तो इन सब की सीमाओं को लांघकर पर से निरपेक्ष स्वतंत्र आत्मधर्म की वृद्धि से संबंधित है। बाह्य निमित्त आदि की अपेक्षा व्यवहार से पूजन-भजन-प्रवचन-कक्षा-पंचकल्याणक-शिविर को प्रभावना कहा जाता है।
अगर आपकी वाणी में मधुरता व विनम्रता हो, शब्दों में सात्विकता हो, व्यवहार में शालीनता हो, व्यापार में प्रामाणिकता हो, भोजन में सादगी हो तो सामने वाला आपकी उत्तम जैन जीवन शैली को देखकर तुरंत कहेगा -
"आपने यह चीज कहां से सीखी?"
आप उसे कहेंगे कि -
"इसमें मेरे धर्मगुरु एवं संस्था की कृपा है।"
फिर भी वह पूछेगा -
"आपके गुरु जी कौन हैं?, आपका धर्म कौन सा है ?, आपने किस संस्था में अध्ययन किया ?"
आप फिर गुरु का नाम और उनकी महिमा, उत्तम,मंगल व शरणभूत धर्म की व्याख्या तथा संस्था का वर्णन करोगे।
फिर वह कहेगा -
"मुझे भी ऐसे गुरु से मिलना है, धर्म को जानना है एवं संस्था को देखना है।"
केवल आप अपने आचरण से भी प्रभावना कर सकते हो। किसी के ह्रदय में श्रद्धा का दीप जला भी सकते हो, बुझा भी सकते हो। आपके 100 प्रयत्नों में से एक व्यक्ति भी सुधरे एवं सन्मार्ग पर आए तो 99 प्रयत्न भी सार्थक है।
कईयों के मन में एक सपना होता है मैं अपने जीवन में एक धर्मस्थल का निर्माण करूं। चाहे फिर मंदिर हो या स्वाध्याय भवन। अगर आप के निमित्त से एक व्यक्ति भी सन्मार्ग में लगता है तो यह अपने आप में मानवमंदिर का निर्माण है। जीवन का कुछ समय निकालकर आप सैकड़ों मंदिरों का निर्माण कर सकते हैं।
शुरुआत में ही लेखन शिर्षक "शिविर के बहाने" दिया है क्योंकि शिविर के निमित्त से जो कुछ भी मन में भाव आए वे निष्कपटतापूर्वक आपके समक्ष रखने का एक छोटा प्रयास किया है जो भविष्य में निरंतर बनाए रखने का भाव है। इस बहाने हमारे पुराने एवं नए साथियों का परिचय होकर उत्साह वर्धन होता रहेगा। आपके आसपास यदि महाविद्यालय में अध्ययनेच्छुक विद्यार्थी हो तो अवश्य सूचित करें इसी भावना से इत्यलम् !
- शास्त्री सतीश गवारे, ध्रुवधाम, बांसवाड़ा
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