ज्ञान

किसी ने कहा है कि एक किताब, एक कलम, एक शिक्षक और एक बालक दुनिया को बदल सकता है। इनको एक सूत्र में पिरोए रखने का कार्य ज्ञान करता है। बिना डोरी के माला का और बिना ज्ञान के इन चारों का कोई वजूद नहीं है। ज्ञान में निमित्त न होने पर अथवा बिना ज्ञान के यह चारों कोई मायने नहीं रखता।

'णाणस्स सारमायारो।' मनुष्य जीवन का सार ज्ञान को कहा है। सूक्तिकार तो यहां तक कहते हैं कि ज्ञान के विना व्यक्ति सिंग और पूॅछ रहित पशु के समान है। इसे बोध , जगत्भानु, जगत्ज्ञान, अवबोध, परिच्छेद इन नामों से अभिहित किया जाता है। मानसशास्त्रीय भाषा में इसे अधिगम अर्थात् सीखना कहते हैं।

'अधिगमोऽर्थावबोधः। अधिगमो णाणपमाणमिदि एगट्ठो।'

अधिगम का अर्थ पदार्थ का ज्ञान है। अधिगम और ज्ञान प्रमाण यह दोनों एकार्थवाची है।

ग्रंथों में इसकी कई परिभाषाएं दृष्टिगोचर होती है। कर्तृसाधन, करणसाधन और भाव साधन की दृष्टि से क्रमशः इसे 1.'जानाति ज्ञायतेऽनेन ज्ञप्तिमात्रं वा ज्ञानम्।' जो जानता है, वह ज्ञान है। 2. जिसके द्वारा जाना जाए, वह ज्ञान है। 3.जानना मात्र ज्ञान है। इस प्रकार परिभाषित किया है। साधनों की अपेक्षा इस में अंतर देखने पर भी जानना इनमें सामान्य है; तीनों में है।

ज्ञान में जानने के साथ-साथ आनंद भी आना जरूरी है। ज्ञान प्राप्ति के समय और ज्ञान प्राप्ति उपरांत यदि आनंद ना आए तो वह ज्ञान बहुत जल्दी विस्मृति को प्राप्त होता है। विद्यार्थी पढ़ाए गए विषय की अवधारणाओं को समझें और आत्मसात किए बिना रटते हैं और परीक्षा के बाद भूल जाते हैं; इसका मूल कारण विषय ज्ञान के प्रति ऊब महसूस होना है। जिसमे वह विषय को यांत्रिक रूप से दोहराता तो है, परंतु संज्ञानात्मक मूल्य न होने से अर्जित ज्ञान विस्मृत हो जाता है। इसलिए मनिषियों को यह कहना पड़ा -

'तज्ज्ञानं यत्प्रतिसमये सम्यक् आनन्दायते।'

अर्थात ज्ञान वही है जो प्रति समय सम्यक् आनंद की बरसात से तृप्त करें।

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